जिग्नेश की 'युवा हुंकार रैली' को नहीं मिली इजाजत, 'जबरदस्ती हुई रैली तो होगी कार्रवाई'

On Date : 08 January, 2018, 12:12 PM
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नई दिल्लीः दलित नेता और गुजरात से निर्दलीय विधायक जिग्नेश मेवाणी को दिल्ली में रैली करने की इजाजत नहीं मिली है. दिल्ली पुलिस ने गणतंत्र दिवस को मेवाणी को रैली करने की इजाजत नहीं दी है. पुलिस का कहना है कि यदि जबरदस्ती रैली की गई तो कार्रवाई की जाएगी. गौरतलब है कि जिग्नेश मेवाणी ने पार्लियामेंट स्ट्रीट में 9 जनवरी को सामाजिक न्याय के लिए 'युवा हुंकार रैली व जनसभा' करने का ऐलान किया था. मेवाणी की रैली का मकसद देश में दलितों पर हो रहे अत्याचार और भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर को रिहा करने की मांग की गई थी.

दिल्ली पुलिस ने गणतंत्र दिवस के दौरान पूरे नई दिल्ली इलाके में धारा 144 लगा दी जाती है. इस दौरान किसी भी तरह के कार्यक्रम की इजाजत नहीं दी जाती है. पुलिस ने कहा कि यदि किसी भी तरह धारा 144 को तोड़ा गया तो कानून के तहत कार्रवाई की जाएगी

आपको बता दें कि जिग्नेश मेवाणी ने भीमा-कोरेगांव में दलितों के कार्यक्रम के दौरान हुई हिंसा के बाद उनपर दर्ज किए गए केस को लेकर बीजेपी और आरएसएस पर निशाना साधा था. 5 जनवरी को दिल्ली में प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में मीडिया से बात करते हुए गुजरात की वडगाम विधानसभा सीट से हाल ही में विधायक चुने गए मेवाणी ने प्रधानमंत्री मोदी से अपील की कि वह देश के दलितों के खिलाफ हो रही हिंसा पर चुप्पी तोड़ें

मेवाणी ने कहा था, ‘‘खुद को आंबेडकरवादी बताने वाले पीएम मोदी चुप क्यों हैं? उन्हें अपना रुख साफ करना चाहिए कि दलितों को शांतिपूर्ण तरीके से रैलियां करने का हक है कि नहीं.’’ मेवाणी ने बताया था कि 9 जनवरी को आहूत अपनी सामाजिक न्याय के लिए युवा हुंकार रैली के दौरान वह मनुस्मृति एवं संविधान की प्रतियां लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) जाएंगे और मोदी से कहेंगे कि वह दोनों में से किसी एक को चुनें.

जिग्नेश मेवाणी ने इस आरोप को नकारा कि पुणे में उन्होंने भड़काऊ भाषण दिया. उन्होंने कहा कि भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) उन्हें निशाना बना रहे हैं. मेवाणी ने कहा, ‘‘न तो मैंने कोई भड़काऊ भाषण दिया और न ही महाराष्ट्र में बंद में हिस्सा लिया. किसी संवैधानिक विशेषज्ञ को मेरे भाषण का विश्लेषण करने और कुछ भी अभद्र ढूंढने को कहें.’’ मेवाणी ने कहा कि 31 दिसंबर को हुई जनसभा के बाद उन्हें माइग्रेन (सिरदर्द) हो गया. उन्होंने कहा, ‘‘जनसभा के बाद मुझे भयंकर माइग्रेन हो गया. न तो मैंने मुंबई में किसी गतिविधि में हिस्सा लिया, न ही बंद में हिस्सा लिया और न ही भीमा कोरेगांव गया.’’  भाजपा और संघ (आरएसएस) मुझे निशाना बना रहे हैं.

गौरतलब है कि बीते 31 दिसंबर को पुणे में भीमा कोरेगांव की लड़ाई के 200 साल पूरे होने की याद में आयोजित कार्यक्रम ‘‘एलगार परिषद’’ में मेवाणी और जेएनयू में देश विरोधी नारे लगाने वाले कश्मीरी छात्र उमर खालिद ने हिस्सा लिया था. पुणे के एक निवासी की ओर से दाखिल शिकायत के मुताबिक, उनके ‘‘भड़काऊ’’ भाषणों का मकसद समुदायों के बीच दुर्भावना पैदा करना था, जिसकी वजह से एक जनवरी को भीमा कोरेगांव में हिंसा हुई.

200 साल पहले लड़ी गई लड़ाई की वर्षगांठ पर हुई हिंसा के विरोध में दलित संगठनों की ओर से कराए गए बंद के कारण तीन जनवरी को महाराष्ट्र में आम जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया था. दलित संगठन भीमा कोरेगांव की लड़ाई में महाराष्ट्र के पेशवा के खिलाफ अंग्रेजों की जीत को याद करते हैं, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि महार समुदाय के सैनिक ईस्ट इंडिया कंपनी के बलों का हिस्सा थे. पेशवा ब्राह्मण थे और भीमा कोरेगांव की लड़ाई में मिली इस जीत को दलितों की जीत के प्रतीक के तौर पर देखा जाता है.

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