गुजरात पहुंची जातीय हिंसा की आग, दलित सेना ...

On Date : 03 January, 2018, 5:07 PM
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अहमदाबाद : महाराष्ट्र के पुणे में सोमवार से भड़की जातीय हिंसा का असर अब पड़ोसी राज्य गुजरात में भी देखने को मिल रहा है. भीमा-कोरेगांव लड़ाई की सालगिरह पर भड़की चिंगारी पूरे महाराष्ट्र में फैल चुकी है. हिंसा में एक व्यक्ति की मौत हुई है. अब वालसाड के वापी में भी दलित सेना ने बुधवार को हाईवे जाम कर टायरों का आग के हवाले कर दिया.

गुजरात के नदुरबार से नासिक जाने वाली बसों को भी रोक दिया गया है. यहां दलित सेना महाराष्ट्र में मराठाओं और दलित के बीच हुए जातीय संघर्ष के खिलाफ सड़क पर उतरी है. संसद से लेकर सड़कों पर इस घटना का असर देखने को मिल रहा है. सदन में आज इस मामले को लेकर जमकर हंगामा हुआ.

महाराष्ट्र सरकार ने इस मामले की न्यायिक जांच के आदेश दिए हैं. हिंसा के खिलाफ बुधवार को कई संगठनों ने बंद बुलाया है. हिंसा के बाद मुंबई के मशहूर डब्बावालों ने भी अपनी सेवाएं बंद रखने का फैसला किया है. इसके अलावा महाराष्ट्र बंद के कारण स्कूल बसों की सर्विस बंद रहेगी. मुंबई में करीब 40,000 स्कूल बस बंद रहेंगी, स्कूलों ने अभिभावकों से अपने वाहन से ही बच्चों को स्कूल छोड़ने को कहा गया है.

दलित समुदाय के इस सालगिरह कार्यक्रम में गुजरात के नवनिर्वाचित विधायक जिग्नेश मेवाणी, उमर खालिद, प्रकाश अंबेडकर और राधिका वेमुला मौजूद थे. माना जा रहा है कि दलित और मराठा समुदाय के लोग आपस में भिड़ गए. फिर यहीं से झड़प हिंसक की शुरुआत हो गई. तेज होते प्रदर्शन को देखते हुए मुंबई में स्कूल-कॉलेजों को बंद करना पड़ा.

भारिपा बहुजन महासंघ के राष्ट्रीय नेता प्रकाश अंबेडकर समेत दलित ग्रुप ने बुधवार को महाराष्ट्र बंद का आह्वान किया है. हालांकि उन्होंने इसे जातीय हिंसा नहीं माना है. रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया के कार्यकर्ता पुणे में विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं.

बता दें कि भीमा कोरेगांव की लड़ाई 1 जनवरी 1818 को पुणे स्थित कोरेगांव में भीमा नदी के पास उत्तर-पू्र्व में हुई थी. यह लड़ाई महार और पेशवा सैनिकों के बीच लड़ी गई थी. अंग्रेजों की तरफ 500 लड़ाके, जिनमें 450 महार सैनिक थे और पेशवा बाजीराव द्वितीय के 28,000 पेशवा सैनिक थे, मात्र 500 महार सैनिकों ने पेशवा की शक्तिशाली 28 हजार मराठा फौज को हरा दिया था.

हर साल नए साल के मौके पर महाराष्ट्र और अन्य जगहों से हजारों की संख्या में पुणे के परने गांव में दलित पहुंचते हैं, यहीं वो जयस्तंभ स्थित है जिसे अंग्रेजों ने उन सैनिकों की याद में बनवाया था, जिन्होंने इस लड़ाई में अपनी जान गंवाई थी. कहा जाता है कि साल 1927 में डॉ. भीमराव अंबेडकर इस मेमोरियल पर पहुंचे थे, जिसके बाद से अंबेडकर में विश्वास रखने वाले इसे प्रेरणा स्त्रोत के तौर पर देखते हैं.

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