नागपुर: मराठा आरक्षण की मांग के साथ ही मुस्लिम आरक्षण की मांग भी अब जोर पकड़ने लगी है. मुस्लिम नेताओं का मानना यही है कि कोर्ट के आदेश के बावजूद भी शिक्षा क्षेत्र में 5% आरक्षण सरकार लागू नहीं कर रही है. मराठा आरक्षण में बड़े वोट बैंक को देखकर सरकार सहित दूसरे दल भी मराठा आरक्षण की वकालत कर रहे हैं, जबकि आर्थिक रुप से कमजोर और शैक्षणिक रूप से पिछड़े मुस्लिम वर्ग को आरक्षण लागू करने के लिए रंगनाथ कमेटी की सिफारिश भी सरकार ने ठंडे बस्ते में डाल दिया है.

मुस्लिम नेता अब सरकार पर आरोप यह भी लगा रहे हैं जाति और धर्म के आधार पर सरकार आरक्षण देना चाहती है ना कि जरूरतमंदों को. 16% मराठा आरक्षण की मांग के बजाय महज 5% आरक्षण शैक्षणिक संस्थानों में मुस्लिम नेताओं के जरिए मांग की जा रही है. मुस्लिम नेताओं का तर्क यह भी है कि कोर्ट ने रंगनाथ कमेटी की सिफारिश के आधार पर ही शैक्षणिक संस्थानों में मुस्लिम छात्रों के दाखिला सहित दूसरे मदों में आरक्षण देने के बात की गई है, जिसे सरकार ने ठंडे बस्ते में डाल दिया है. मुस्लिम आरक्षण होने से ही पिछड़े मुस्लिम वर्ग का उत्थान हो सकता है, जिससे वह मुख्यधारा में भी जुड़ सकते हैं ऐसा मुस्लिम नेताओं का तर्क है.

औरंगाबाद से एआईएमआई के विधायक का कहना है कि " सरकार सिर्फ मराठों के लिए ही बोल रही है. धनगारों के लिए कौन कहेगा. धनगारों का रिप्रजेंटेशन विधानसभा में कम है. उस पर कोई नहीं कहेगा ना ही मुसलमानों के लिए.  मुंबई हाई कोर्ट  ने कहा है की मुसलमानों को 5 % रिजर्वेशन मिलना चाहिए. पर क्यों तुम उस बात पे चर्चा नहीं कर रहे. "बात यहीं खत्म नहीं होती मुस्लिम नेताओं का यह भी कहना है कि मराठा वोटरों को देखते हुए उन्हें लुभाने के लिए केवल सरकार ही नहीं दूसरे दल भी आगे बढ़ चढ़कर आ रहे हैं.

जिन दलों  के मुखिया ने कभी आरक्षण की वकालत नहीं की थी अब उन दलों के अध्यक्ष भी आरक्षण की मांग को लेकर सबसे आगे आ रहे हैं. शिव सेना उसी तरह का एक उदाहरण है. पिछले दिनों मराठा आरक्षण के आंदोलनकारियों ने जिस तरीके से महाराष्ट्र के कई हिस्सों में विरोध किया उस विरोध से सरकार घबराई हुई दिख रही है और उन्हें आरक्षण देकर संतुष्ट करना चाहती है. जबकि मुस्लिम आरक्षण के स्वर अब और बुलंद हो रहे है.

समाजवादी पार्टी के नेता अबू आजमी के मुताबिक ", पिछले 4 साल से विधानसभा में हम चीख चीखकर कर रहे हैं कि मुसलमानों का आरक्षण जिस तरीके से कोर्ट ने कहा है उस पर चर्चा की जाए और उसे दिया जाए लेकिन सरकार चुप्पी साधे बैठी हुई है सरकार केवल अपने ही लोगों मैं आरक्षण के बंदर बांट कर रही है . निश्चित रूप से मुस्लिम समाज दबा हुआ है कुचला हुआ है और पिछड़ा हुआ है. "

महाराष्ट्र सरकार में पिछले दो दशकों से सत्ता में रहे एनसीपी मराठा आरक्षण को तो जरूरी करने के लिए बात कह रही है. हालांकि सत्ता में रहते हुए मराठा आरक्षण लागू एनसीपी नहीं कर सकी. मुस्लिम आरक्षण की बात भी एनसीपी के जरिए शुरू की गई है लेकिन मराठा आरक्षण की आवाज को ज्यादा बुलंद किया गया है. एनसीपी के तरफ से यह भी स्पष्ट किया गया है कि मुस्लिम आरक्षण भी जरूरी है लेकिन सबसे पहले मराठा आरक्षण को लागू करने के लिए सरकार पर दबाव डालने की कोशिश की गई है.

गौरतलब है कि एनसीपी पार्टी में भी मराठाओं का वर्चस्व है एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार खुद मराठा है उनके भतीजे अजित पवार भी मराठा आरक्षण की वकालत करते हुए स्पष्ट करते हैं कि मराठाओं में कई लोग पिछड़े हैं जिन्हें आरक्षण की जरूरत है.अब सरकार के अब सामने  समस्या यह है कि आखिर 16% आरक्षण मराठा और 5% आरक्षण मुस्लिम समुदाय को किस तरह से लागू करे. सुप्रीम कोर्ट के आदेश और अनुसंशा को किस तरह से लागू करे. हालांकि राज्य सरकार इस मसले पर कुछ इस तरह से अपना मत रख रहा है. लेकिन आरक्षण को लागू करने में कई अभी मंजिल पार करने हैं और  इस बात से अवगत भी करा रहे. आरक्षण लागू करने में सरकार की कोई भी दुर्भावना नहीं है इसे बड़े सलीके से स्पष्ट भी कर रहे हैं.

हालांकि सरकार अपनी भूमिका कितने भी स्पष्ट कर ले लेकिन आरक्षण को लागू करने में उसे कई अड़चनों को सरकार के वित्त मंत्री सुधीर मुनगंटीवार के  मुताबिक "मुस्लिम समाज के लिए ऐसा नहीं है कि सरकार ने सोचा नहीं और उनके लिए काम नहीं किया सरकार ने औरंगाबाद  में विश्कविद्यालय शुरू किया है.पार्टी हर एक तक लाभ पहुँचाने को प्रतिबद्ध है, भले ही इसके लिए राज्य पर आर्थिक दबाव पड़ेगा, राजनीतिक दल अपने कार्यकाल में कुछ नहीं कर पाए इसी सरकार से सारा हल चाहते हैं',."भले ही मराठा आरक्षण लागू होने के बाद आखिर फायदा किन लोगों को मिलेगा यह तो वक्त बताएगा.लेकिन मराठा आरक्षण के मुद्दे ने कई लोगों को वायदे की रेवड़ियां बाँटने और बयानों की तल्खी के साथ राजनीति चमकाने के अवसर जरूर दे दिए हैं.