बड़वानी : ‘मंजिल मिल ही जाएगी भटकते ही सही, गुमराह तो वो हैं जो कभी घर से ही नहीं निकले’। ये कहावत एकदम सटीक बैठती है आदिवासी बहुल जिले बड़वानी के पारसिंह परिहार पर। जिन्हें दोनों हाथों से लाचार होने के कारण पैर से लिखने का हुनर और उनका जज्बा अन्य छात्रों से अलग करता है।

पारसिंह के लिए आठवीं पास करने के बाद कक्षा नौ में दाखिले का संघर्ष आसान नहीं रहा। लेकिन मंहनत रंग लाई और कई स्कूलों के चक्कर लगाने के बाद आखिरकार एक सरकारी स्कूल में दाखिला नसीब हो सका। वह भी तब, जब दिव्यांग बालक पारसिह ने जिला प्रशासन से मदद की मार्मिक गुहार लगाते हुए कहा कि ‘वह आगे पढ़ना चाहता है’।

पारसिंह को स्कूल में दाखिला दिलाने के बाद अब प्रशासन उन शैक्षणिक संस्थाओं के खिलाफ जांच कर रहा है जिन्होंने जनजातीय समुदाय के दिव्यांग छात्र को प्रवेश देने से मना किया था। जिलाधिकारी अमित तोमर ने बताया कि ‘हमने पारसिंह का दाखिला बड़वानी के एक सरकारी स्कूल में करा दिया है। इसके साथ ही, शिक्षा विभाग के जिला परियोजना समन्वयक (डीपीसी) को आदेश दिया गया है कि वह जांच कर पता लगाए कि संबंधित स्कूलों ने उसे दाखिला देने से किस आधार पर इंकार किया था’।

पारसिंह को शारीरिक विकृति के कारण स्पष्ट बोलने में भी तकलीफ होती है। अपने गांव के सरकारी मिडिल स्कूल से आठवीं पास करने के बाद वह तमाम प्रयासों के बावजूद वह किसी भी स्कूल में नौवीं में दाखिला पाने में नाकाम रहा। थक-हारकर उसने सात अगस्त को जन सुनवाई में गुहार लगाई और दिव्यांगता के कारण हुए कथित भेदभाव की आपबीती सुनाई। जिसके बाद पारसिंह को बड़वानी के शासकीय बालक उच्चतर माध्यमिक विद्यालय क्रमांक दो की कक्षा-नौ में प्रवेश मिला।

स्कूल के प्राचार्य इकबाल आदिल ने बताया, ‘स्कूल में दाखिला पाकर पारसिंह बेहद खुश है। वह सामान्य बच्चों के साथ ही पढ़ाई कर रहा है’। उन्होंने बताया, ‘पारसिंह की लिखावट देखकर कोई भी नहीं कह सकता कि वह पैर से लिखता है। हम स्कूल में उस पर विशेष ध्यान दे रहे हैं’।