नई दिल्ली: देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी अब नहीं रहे. वाजपेयी ने दिल्ली के एम्स में आखिरी सांस ली. वह बुधवार से जीवन रक्षक प्रणाली पर थे. भारतीय जनता पार्टी के 93 वर्षीय दिग्गज नेता को किडनी ट्रैक्ट इंफेक्शन, यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन, पेशाब आने में दिक्कत और सीने में जकड़न की शिकायत के बाद 11 जून को अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) दिल्ली में भर्ती कराया गया था. अटल बिहारी वाजपेयी की पहचान उनकी दूरदृष्टि के लिए होती थी. उन्होंने अपने प्रधानमंत्री रहते जब परमाणु परिक्षण कराया तो दुनिया ने उसे नकार दिया, लेकिन उनके उसी फैसले की बदौलत आज भारत एक बड़ी परमाणु शक्ति है.

1998 में हुए पोखरण न्यूक्लियर टेस्ट के बाद जब आर्थिक मोर्चे पर वाजपेयी सरकार को झटका लगा. अर्थव्यवस्था चरमाकर 7.8 फीसदी से गिरकर 5 फीसदी पर आ गई. दुनिया के ताकतवर देशों ने भारत पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिया था. इसके बाद भी अटल बिहारी वाजपेयी अपने फैसले पर अडिग रहे. उन्होंने संसद में विपक्ष की आलोचना का जवाब दिया. करीब साढ़े 7 मिनट तक जब अटल बिहारी वाजपेयी ने भाषण दिया तो पूरा विपक्ष चुपचाप सुनता रह गया. अटल जी ने संसद में पोखरण मामले पर जवाब दिया.

संसद में बोलते हुए उन्होंने कहा कि परमाणु परिक्षण की आलोचना की गई. यह बेहद दुखद है. 1974 में जब मैं सदन में था और इंदिरा गांधी के नेतृत्व में परमाणु परिक्षण किया गया तो उन्होंने उसका समर्थन किया था. क्योंकि, यह देश की रक्षा से जुड़ा मामला था. उन्होंने कहा कि आत्मरक्षा की तैयारी तब करनी होगी, जब खतरा हो. क्या खतरा आने से पहले ही तैयारी कर लेना ठीक नहीं है. उन्होंने कहा कि 50 साल का हमारा अनुभव क्या बताता है. क्या रक्षा के मामले में हमे आत्मनिर्भर नहीं होना चाहिए.

उन्होंने आगे कहा कि GDP और महंगाई के आंकड़ों के बीच प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी न्यूक्लियर टेस्ट के अपने फैसले से पीछे नहीं हटे. उन्होंने संसद में न्यूक्लियर टेस्ट से बढ़ी आर्थिक चुनौतियों पर कहा हमने बहुत देर कर दी, यह टेस्ट बहुत पहले करना चाहिए था. खुद को न्यूक्लियर पॉवर घोषित कर देना चाहिए था. आपको बता दें, अटल ही वह शख्स थे, जिसने कांग्रेस के 1991-1996 कार्यकाल में भी न्यूक्लियर टेस्ट कराने की कोशिश की थी. लेकिन, अमेरिकी दबाव के चलते ऐसा नहीं हो सका था.

आपको बता दें, अटल बिहारी वाजपेयी अपने विरोधियों पर तीखे प्रहार करते थे, लेकिन कभी भी अपने शब्दों की मर्यादा को नहीं लांघते थे. यूं कहे कि वाजपेयी के दौर में राजनीतिक शब्दों की मर्यादा बेहद सभ्य थी. एक बार की बात है सोनिया गांधी ने नेता प्रतिपक्ष होने के नाते अंग्रेजी के तल्ख शब्दों के साथ एनडीए सरकार पर हमला की थीं, जिसके बाद वाजपेयी ने गुस्से में आकर उनसे कहा था कि मतभेद को जाहिर करने के लिए ऐसे शब्द प्रयोग करना ठीक नहीं है.