नई दिल्लीः किसी ने यह सच ही कहा है कि ना जाने काैन सा ऐसा वक्त आ जाए जो आपको अर्श से फर्श आैर फर्श से अर्श तक ले जाए। हिमाचल प्रदेश के मनाली से छह किलोमीटर दूर जगतसुख गांव में रहने वाली कविता ठाकुर भी कभी एक पल का खाना खाने के लिए दिन-रात मेहनत करती थी, लेकिन अब ऐसा वक्त आ गया उसके पास वो हर चीज है जिसे हर इंसान पाना चाहता है। 24 वर्षीय कविता जो कि आज भारतीय महिला कब्बडी टीम की स्टार खिलाड़ी हैं, कभी अपने पिता के माता-पिता के साथ ढाबे पर काम में हाथ बंटाती थी।

2014 के एशियाड में गोल्ड मेडल मिलने के बाद वह चर्चा में आई और इसके बाद राज्य सरकार ने भी उनकी कुछ आर्थिक सहायता की। कविता अब अपने परिवार जिसमें माता-पिता, बड़ी बहन और छोटे भाई अशोक के साथ मनाली शहर के नजदीक एक घर में शिफ्ट हो गई हैं। कविता कहती हैं कि जब मैंने अपने परिवार को रहने के लिए एक अच्छे घर में लाई, वह मेरी जिंदगी का सबसे खुशनुमा पल था। अब मेरे भाई भाई को अच्छी शिक्षा मिलेगी। कविता की मां कृष्णा देवी कहती हैं कि यह कविता की कड़ी मेहनत का परिणाम है, जिससे हमारे सिर पर छत मिला है। कुछ साल पहले तक हम ढ़ाबा के अलावा और कहीं इस तरह से रहने के लिए सोच भी नहीं सकते थे। मेरी इच्छा है कि वह देश के लिए ओर ख्याती प्राप्त कर सके।

कविता ने कहा, ''सर्दियों में हम दुकान के फर्श पर सोते थे, जो बर्फ की तरह ठंडा होता था। लेकिन हमें ठंड में ही सोना पड़ता था, क्योंकि हमारे पास गद्दे खरीदने के लिए पैसे नहीं थे। कई बार पैसे नहीं होते थे, तो हम भूखे रहते थे। जब मैं अपने माता-पिता के साथ ढ़ाबे पर काम करती थी, मैं बर्तन धोने, फर्श साफ करने के लिए अलावा कई और काम भी करती थी। मेरा बचपन और किशोरावस्था काफी परेशानियों में बीता।''

बता दें कि कविता इस बार भी एशियन गेम्स में भारत का प्रतिनिधित्व कर रही हैं। साल 2014 में हुए एशियन गेम्स में भारत को गोल्ड मेडल दिलाने में भी कविता का अहम योगदान था। इस साल एशियन गेम्स में नौ सदस्यीय भारतीय टीम में कविता डिफेंडर की भूमिका में दिखेंगी।