दिवाली से 3 दिन पहले मनाए गए वसुबारस के शुभ अवसर पर पुणे का ऐतहासिक शनिवारवाडा हजारों दियों की रोशनी से जगमगा उठा. कभी पेशवाओं के जमाने में इसका खास अंदाज हुआ करता था, जिसे फिर से संवारा जा रहा है.

इस तरह दिवाली की शुरुआत दीपोत्सव से करने की परंपरा 1734 में पेशवाओं के राज में शुरू की गई थी और ये दीपोत्सव की परंपरा 1818 तक बरकरार रही जब तक शनिवारवाडे पर मराठा राज का झंडा लहराता रहा.

शनिवारवाडा की यह शानदार परंपरा सालों तक बंद रही लेकिन 1999 में इस परंपरा की फिर से शुरुआत की गई. 19 वर्ष पहले पुणे के चैतन्य हास्य क्लब द्वारा यह परंपरा फिर से शुरू की गई. वसुबारस की श्याम शनिवारवाडा को 80 हजार दियो से सजाया जाता है.

इस परंपरा की जानकारी देते हुए चैतन्य हास्य क्लब के सदस्य प्रभाकर घुले ने बताया कि पेशवाओं के राज में ये दीपोत्सव मनाया जाता था, लेकिन अंग्रेजों ने इस परंपरा को बंद करवा दिया, जब चैतन्य हास्य क्लब को यह जानकारी की मालूम हुई तो 19 वर्ष पहले इस दीपोत्सव की परंपरा फिर से शुरुआत की गई.
 
शनिवारवाडा के सामने हजारों दियों से मानो रंगोली बनायी हो, आकाश से दृश्य मन लुभाने वाला था, शनिवारवाडा मानो फिर से अतीत में चला गया हो ऐसे लग रहा था.