वो दन हवा हुए जब खलील खां फाख्ता उड़ाते थे। गोया के साठ से नब्भे की दहाई तक कई सारे पत्रकार साईकिलों या छोटी सी मोपेड से चला करते थे। जिनके कने स्कूटर होती थी वो बड़े तनके चलते। बारा-पन्द्रा रुपे लीटर का पेट्रÑोल बी मेंगा लगता था खां। लिहाजा भोपाल की घाटियों के उतार पे भाई लोग गाड़ी बंद करके रोलिंग में उतरते। तब चार पहिया गाड़ियां तो अखबार मालिकों के पास ही हुआ करतीं थीं। बाकी खां तब से लेके अब तलक भोपाल के बड़े तालाब में भोत पानी भे चुका हेगा। अब पत्रकारों के मआली हालात भी किसी हद तक ठीक हो गए हैं। कुछ की सेटिंग तो कुछ के हुनर ने उने भी लग्जरी आईटमों की तरफ रुजू कर दिया। कल धनतेरस पे शहर में करोड़ों की गाड़ियां उठीं। खबर है कि कई पत्रकारों ने नई गाड़ियां खरीदीं। पांच से दस लाख के बीच की कारें ज्यादा खरीदी गर्इं। पुरानी गाड़ी कटवा के और नई के लिए तीन चार लाख का लोन लेना सस्ता सौदा साबित हुआ। वहीं कई रिपोर्टरों ने भी नई बाइकें खरीदीं हैं। आप सभी साथियों को उजाले के इस मुकद्दस त्यौहार दिवाली की दिली मुबारकबाद।