नई दिल्‍ली : आज स्वामी विवेकानंद की 156वीं जयंती है. उनका जन्‍म 1863 में आज ही के दिन कोलकाता में हुआ था. उनके विचार आज भी प्रासांगिक बने हुए हैं. स्वामी जी के विचार किसी भी व्यक्ति की निराशा को दूर कर सकते हैं. उसमें आशा भर सकते हैं. प्रस्तुत हैं स्वामी जी के कुछ ऐसे ही विचार...

  • उठो और जागो और तब तक रुको नहीं जब तक कि तुम अपना लक्ष्य प्राप्त नहीं कर लेते.
  • आप जो भी सोचेंगे. आप वही हो जाएंगे. अगर आप खुद को कमजोर सोचेंगे तो आप कमजोर बन जाएंगे. अगर आप सोचेंगे की आप शक्तिशाली हैं तो आप शाक्तिशाली बन जाएंगे.
  • एक विचार चुनिए और उस विचार को अपना जीवन बना लिजिए. उस विचार के बारे में सोचें उस विचार के सपने देखें. अपने दिमाग, अपने शरीर के हर अंग को उस विचार से भर लें बाकी सारे विचार छोड़ दें. यही सफलता का रास्ता हैं.
  • एक नायक की तरह जिएं. हमेशा कहें मुझे कोई डर नहीं, सबको यही कहें कोई डर नहीं रखो.
  • ब्रह्मांड की सारी शक्तियां पहले से ही हमारे भीतर मौजूद हैं. हम ही मूर्खतापूर्ण आचरण करते हैं, जो अपने हाथों से अपनी आंखों को ढक लेते हैं...और फिर चिल्लाते हैं कि चारों तरफ अंधेरा है, कुछ नजर नहीं आ रहा है.
  • अगर आप पौराणिक देवताओं में यकीन करते हैं और खुद पर यकीन नहीं करते हैं तो आपको मुक्ति नहीं मिल सकती है. अपने में विश्वास रखो और इस विश्वास पर खड़े हो जाओ, शक्तिशाली बनो, इसी की हमें जरूरत है.
  • ताकत ही जीवन है और कमजोरी मौत है
  • ब्रह्मांड की सारी शक्तियां पहले से ही हमारे भीतर मौजूद हैं. हम ही मूर्खतापूर्ण आचरण करते हैं, जो अपने हाथों से अपनी आंखों को ढक लेते हैं…और फिर चिल्लाते हैं कि चारों तरफ अंधेरा है, कुछ नजर नहीं आ रहा है.
  • जिस प्रकार विभिन्न धाराओं के स्त्रोत अलग-अलग होते हैं, लेकिन अंत में उनका जल जाकर समुद्र में मिल जाता है, उसी प्रकार सभी मनुष्यों द्वारा चुना गया उनका रास्ता, चाहे वह सही हो या गलत हो अंत में सब ईश्वर तक ही जाते हैं।
  • अंधविश्वास मनुष्य का बड़ी शत्रु है, लेकिन धर्मान्धता उससे भी बुरा है।
  • शिक्षा मनुष्य में पहले से पूर्णता का प्रकटीकरण है।
  • हम ऐसी शिक्षा चाहते हैं जो चरित्र का निर्माण करे, जिससे मनोबल बढ़े, बुद्धि का विस्तार हो और व्यक्ति अपने पैरों पर खड़ा हो सके।
  • जब तक लाखों लोग भूखे और अज्ञान होंगे, मैं हर उस व्यक्ति को देशद्रोही ठहराऊंगा हूँ, जो अपने खर्चों पर शिक्षित हो गए हैं और उन पर ध्यान नहीं दिया।
  • सफलता के लिए पवित्रता, धैर्य और दृढ़ता तीनों अनिवार्य है और इनसे भी ऊपर है प्रेम।
  • जो दूसरे के लिए जीते हैं वह अकेले ही जीते है, वरना अन्य तो जीवित होकर भी मृत हैं।
  • देवत्व की अभिव्यक्ति मनुष्य में पहले से ही है।
  • यह सभी उपासनाओं का सार हैं- पवित्र होना और दूसरों का भला करना।
  • यदि आपको अपने 330 करोड़ पौराणिक देवताओं पर विश्वास है, लेकिन खुद पर विश्वास नहीं है, तो आपको मोक्ष नहीं मिल सकता, आप खुद पर विश्वास रखो और मजबूत बनो।