नई दिल्ली: राजधानी दिल्ली से केवल 68 किलोमीटर दूर स्थित है, उत्तर प्रदेश की अहम बुलंदशहर लोकसभा सीट. बुलंदशहर आरक्षित सीट है. साल 2018 के आखिरी महीने में ये लोकसभा सीट खूब चर्चा में आई. गोहत्या के शक में भड़की हिंसा के बाद पूरे देश में बुलंदशहर की चर्चा हुई. इसलिए इस बार उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में होने वाला लोकसभा चुनाव इस बार अहम होने वाले हैं.

ऐसे मिला शहर को नाम
बुलंदशहर पांडवों की राजधानी हस्तिनापुर से बहुत करीब था. हस्तिनापुर न मिलने की वजह से बुलंदशहर में स्थित अहार पांडवों के लिए बहुत आवश्यक स्थान बन गया. राजा परमां ने यहां अपना किला बनवाया. अहिबरन नाम के राजा ने यहां एक बरन मीनार की नीवं रखी और इस शहर को अपनी राजधानी बनाया. तब इसका नाम बारनशहर था. जो अधिकारिक तौर पर बुलंदशहर कहा जाने लगा. यह पहाड़ के ऊपर की समतल भूमि पर बसा था इसलिए इससे मुग़ल काल में फारसी भाषा में बुलंदशहर नाम दिया गया.

ये है राजनीतिक इतिहास
राजनीतिक घटनाक्रम यहां पहला लोकसभा चुनाव 1952 में हुआ, जिसमें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के रघुबर दयाल मिश्र भारी मतों से विजयी हुए थे. वो लगातार 10 सालों तक बुलंदशहर के सांसद रहे, तीसरे लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के ही नेता सुरेंद्र पाल सिंह सांसद की कुर्सी पर बैठे और लगातार 3 बार जीत हासिल की. साल 1977 में भारतीय लोकदल के बाबू बनारसी दास बुलंदशहर के सांसद बने थे. साल 1984 के बाद से यहां कांग्रेस कभी भी नहीं जीत पाई. 1991 से लेकर साल 2004 के चुनावों तक यहां बीजेपी का कब्जा रहा, साल 2004 में बीजेपी के नेता कल्याण सिंह यहां के सांसद बने. साल 2009 के चुनाव में बीजेपी को सपा के कमलेश बाल्मिकी के हाथों हार का सामना करना पड़ा लेकिन साल 2014 में उसने जबरदस्त ढंग से इस सीट पर बीजेपी ने वापसी की.

2014 में ये था समीकरण
बुलंदशहर लोकसभा सीट पर इस वक्त बीजेपी का कब्जा है. साल 2014 में यहां पर बीजेपी के डॉ. भोला सिंह ने बसपा को हराकर सीट पर अपना नाम किया था. साल 2014 के चुनाव में 17,36,436 वोटरों ने हिस्सा लिया था.