यूं तो तमाम जुल्म हैं, मजबूरियां हैं, बंदिशें हैं, फिर भी कुछ उम्मीदें हैं, ख्वाब हैं जिंदगी है। नवदुनिया में पत्रकारों के क्लासिफिकेशन से पत्रकार दो खेमों में बंटे नजर आते हैं। वहां कुछ चहेते पत्रकारों को कंपनी का आॅनरोल कर्मचारी बना दिया जाता है तो वहीं जिनका कोई धनी धोरी नहीं होता वो पत्रकार बिचारे आॅफरोल बना दिए जाते हैं। आॅफरोल बोले तो इनका कंपनी में कोई रिकार्ड नहीं रहता। यहां तक कि आॅफरोल पत्रकार को नवदुनिया का आईडी कार्ड तक जारी नहीं किया जाता। इनका न पीएफ कटता है और अधिमान्यता मिलती है। सबसे बड़ा मआली नुकसान ये होता है के आॅफरोल वालों को सालाना इन्क्रीमेंट तलक नहीं मिलता। वहीं आॅनरोल वालों के मजे हेंगे। उने बाकायदा अपॉइंटमेंट लेटर मिलता है। छुट्टीयां वगैरह भी तय होती हैं। नवदुनिया में इस सिस्टम से पत्रकार दो खेमों में बंटे नजर आते हैं। अब ऐसा है भाई लोगों, के गर दिक्कत है तो आवाज भी खुद उठाना पड़ेगी, नर्इं तो खां भुगतते रहो, और जैसा चल्लिया हेगा वेसाई चलने दो।