अजीब दर्द का रिश्ता था सब के सब रोए, शजर गिरा तो परिंदे तमाम शब रोए। दरख्त और परिंदों का कित्ता करीब का साथ है। और ये दोनों ही इंसानी जिंदगी को निहायत हसीन भी बनाते हैं। शहर के दो पत्रकारों ने वृक्षारोपण और परिंदों के लिए सकोरों में पानी और दाने के लिए अपने स्तर पे एक अभियान चलाया हुआ है। सीनियर जर्नलिस्ट मिलिंद कुलकर्णी पिछले 24 सालों से लोगों को पौधे बांट रहे हैं। अब तो इनके  घर का बगीचा ही नर्सरी बन गया है। मिलिंद यहां बड़, पीपल, नीम, आम सहित ऐसे पौधे विकसित करत हैं जिनकी आयु पचास से सौ साल होती है। इनके इस अभियान में बुहत सारे लोग जुड़ गए हैं। अब तो लोग खुद इनके घर पौधे लेने आते हैं। ये लोगोें को बताते हैं कि वे बीजों को एक कपड़े की थेली में रख कर यात्रा के दौरान जंगल में फैंक देंगे तो उनमें से कई पेड़ बन जाएंगे। वहीं युवा पत्रकार शक्ति रावत हर गर्मी में परिंदों की फिक्र करते हैं। शक्ति अपने स्तर पर सकोरा अभियान चलाते हैं। परिंदों को पानी के लिए ये सकोरे बांटते हैं। शहर की कई कालोनियों के पेड़ों पर इन्होंने सकोरे लटकाए हैं। अपने घर के आसपास की कालोनियों में पेड़ों पर लटकाए सकोरों में ये खुद पानी भरते हैं और लोगों को इसके लिए प्रेरित करते हैं। रोज सुबह दो घंटे ये इस काम को देते हैं। शक्ति अभी तक सैकड़ों सकोरे बांट चुके हैं। इनका कहना है कि भयंकर गर्मी में ज्यादातर परिंदों की मौत प्यास से हो जाती है। आप दोनों को अपने इस नेक क ाम के लिए मुबारकबाद।