नई दिल्ली: 23 मई 2019 को जब लोकसभा चुनाव के नतीजे आए तो कांग्रेस महज़ 52 सीटों पर सिमट गयी. 2014 के नतीजों से सिर्फ 6 सीटें ज़्यादा और उसी दिन ख़बरें आने लगी कि राहुल गांधी अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा देना चाहते है. इसके बाद सोनिया गांधी ने कुछ वरिष्ठ नेताओं से उनकी राय मांगी तो सबने कहा कि कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक बुलायी जाए और राहुल गांधी को जो बात करनी है पार्टी के भीतर करें और हुआ भी वैसा ही.

दो दिन बाद जब कांग्रेस वर्किंग कमेटी बैठक हुई तो राहुल गांधी ने ये साफ़ कर दिया कि वो पार्टी के अध्यक्ष नही रहना चाहते और साथ ही ये भी कह दिया कि गांधी परिवार से बाहर का अध्यक्ष चुन लीजिए. तब से ही कहानी शुरू हो गई कि क्या “मान गए राहुल गांधी”?

इतना ही नही पार्टी के वरिष्ठ नेता भी एक-दूसरे से हर रोज़ पूछ रहे हैं क्या हुआ ? कुछ पता चला ? राहुल को मनाने की कहानी कोई नई बात नही है अब काग्रेस और गांधी परिवार उन्हें अध्यक्ष पद ना छोड़ने के लिए मनाना चाहती है लेकिन इससे पहले 2016 की शुरूआत होते ही खबर आयी “मान गए राहुल गांधी" जल्द ही अध्यक्ष बनेंगे.

2015 की शुरूआत भी ऐसी की खबरो के साथ हुई थी लेकिन बजट सत्र के पहले दिन जब सोनिया गांधी ने खुद संसद भवन परिसर मे कहा राहुल गांधी छुट्टी पर हैं तो उसके बाद राहुल पर न जाने कितने तरह के नीजि और राजनीतिक हमले हुए और 2014 की हार के समय जो उनकी छवि खुद कांग्रेस के लोगो ने बनाई थी वो और भी पुख्ता हो गयी.

भला कोई भारत की राजनीति मे छुट्टी पर कैसे जा सकता है? लेकिन उस वक्त कोई समझ नही पाया कि वह पार्टी और अपनी मां से नाराज होकर लम्बी छुट्टी पर गये थे. राहुल गांधी दरअसल 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले दो मुख्यमंत्री और राष्ट्रीय कांग्रेस मे फेरबदल चाहते थे लेकिन ऐसा कुछ हो नही पाया. जब पार्टी 44 सीटो पर सीमटी तो देश और कांग्रेस पार्टी के भीतर राहुल गांधी की क्षमता पर सवाल उठने लगे.

चुनावी हार के बाद राहुल ने फिर से फेरबदल की बात की लेकिन महीनो के बाद भी राहुल और उनकी कांग्रेस वही खड़ी रही. 57 दिन तक राहुल नाराज़ रहे और जब लौटे तो कुछ ही दिनों के बाद पंजाब के चुनाव सामने थे. फिर वही हुआ उनकी मर्ज़ी के विपरीत कैप्टन अमरिंदर सिंह पंजाब की कमान सौंप दी गयी.

ऐसा क्या था जो राहुल को अध्यक्ष बनने से रोक रहा था ? और ऐसा भी नही की कोई दूसरा इस पद का दावेदार हो ? तो फिर सवाल यही कि राहुल गांधी को उस वक्त क्या विश्वास दिलाया गया कि वो मान गए. जब राहुल दिल्ली लोटे तब भी पहली तस्वीरो मे मं और बहन के साथ ही नजर आये थे. तो सवाल ये है कि राहुल माने किस शर्त पर थे ?

दिल्ली के राम लीला मैदान मे किसानो की रैली करना, केदारनाथ मंदिर के दर्शन, विदर्भ मे किसानो से मिलना, मथुरा मे बांकेबिहारी के दर्शन करना, तेलंगाना,असम और नाजाने कितने कार्यक्रम राहुल गांधी ने 2015 मे किए और बार बार ऐसा खबरे आती रही कि "मान गए राहुल" . क्या इन्ही बातो को लेके नाराज थे राहुल, ये सब तो वो 2007 से कर ही रहे थे फिर चाहे वो दलितो के घर मे जाकर सोना हो या फिर भट्टा परसोल की यात्रा हो, तो फिर राहुल गांधी की नाराजगी किस बात को लेकर थी.

इन सबके बीच जब भी ये खबर आयी की राहुल अध्यक्ष बनने वाले है उसी समय सोनिया गांधी की सक्रियता एक दम तेज हो जाती थी. फिर चाहे वो हरियाणा और राजस्थान जाकर किसानो से मिलना हो, भूमि अध्यादेश पर राष्ट्रपति भवन तक मार्च करना हो या फिर जीएसटी पर मोदी से मुलाकात. अब सवाल ये कि क्या ये सब महज एक इतेफाक था.

अख़िर मे राहुल गांधी ने ज़िद करके दिसम्बर 2017 मे पार्टी की कमान थाम ली और सोनिया के नज़दीक लोगो अपने आप मे ख़ुद को कमजोर समझने लगे या असहाय हो गए. राहुल गांधी के अध्यक्ष बनने के बाद उनके सामने सबसे बडी चुनौती थी 2018 मे होने पांच राज्यों के चुनाव. राहुल के भविष्य की नींव इन्हीं नतीजों के साथ लिखी जानी थी और जब नतीजे आए तो राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ मे काग्रेस की सरकार बन गयी और राहुल की लीडरशीप पर लेख लिखे जाने लगे. लेकिन राहुल काग्रेस पार्टी मे बदलाव का संदेश देने मे तब नाकाम रहे जब कमलनाथ और अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री बनाने का फ़ैसला लिया गया.

सीनियर नेताओं को राज्यों की कमान सौंपने के पीछे तर्क दिया गया जल्द ही लोकसभा चुनाव आने वाले है और हमें ज़्यादा से ज़्यादा सीटें जीतनी है लेकिन इन तीन राज्यों की 65 सीटों मे से काग्रेस महज़ 3 सीट ही जीत पायी. काग्रेस के कार्यकर्ताओं ने ये कहना शुरू कर दिया था कि राहुल ख़ुद तो अध्यक्ष बन गए लेकिन बदलाव का संदेश नही दे पाए ख़ास तौर पर तीन राज्य जितने के बाद और 25 मई को राहुल गांधी ने राजनीतिक रूप से हथियार डाल दिए. आज काग्रेस के नेता, कार्यकर्ता हर रोज़ एक दूसरे से पूछते है क्या "मान गए राहुल गांधी" ?