जम्मू: कश्मीर घाटी से कश्मीरी पंडितों के पलायन के 30 वर्ष पूरे होने पर जम्मू में कश्मीरी पंडितों ने प्रदर्शन किया. प्रदर्शनकारियों का कहना था कि हम अपने ही देश में शरणार्थी की तरह रह रहे हैं, लेकिन किसी को हमारी चिंता नहीं है. प्रदर्शनकारियों का कहना है कि वह जल्द से जल्द कश्मीर लौट जाना चाहते हैं.

बता दें तीस साल पहले कश्मीर से अल्पसंख्यक कश्मीरी पंडितों का पलायान हुआ. इस बीच कितनी ही सरकारें बदलीं, कितने मौसम आए..गए, पीढ़ियां तक बदल गईं, लेकिन कश्मीरी पंडितों की घर वापसी और न्याय के लिए लड़ाई जारी है.

तीस साल पहले कश्मीर से अल्पसंख्यक कश्मीरी पंडितों का पलायान हुआ. इस बीच कितनी ही सरकारें बदलीं, कितने मौसम आए..गए, पीढ़ियां तक बदल गईं, लेकिन कश्मीरी पंडितों की घर वापसी और न्याय के लिए लड़ाई जारी है.

पलायन की कहानी किसी से छिपी नहीं है. सन् 1989-1990 में जो हुआ, उसका उल्लेख करते-करते तीस साल बीत गए, लेकिन इस पीड़ित समुदाय के लिए कुछ नहीं बदला है. लेकिन जो बदल रहा है उससे इस सुमदाय के अस्तित्व, संस्कृति, रीति-रिवाज, भाषा, मंदिर और अन्य धार्मिक स्थल धीरे-धीरे समय चक्र के व्यूह में लुप्त होने के कगार पर है.

जनवरी का महीना पूरी दुनिया में नए साल के लिए एक उम्मीद ले कर आता है, लेकिन कश्मीरी पंडितों के लिए यह महीना दुख, दर्द और निराशा से भरा है. 19 जनवरी प्रतीक बन चुका है उस त्रासदी का, जो कश्मीर में 1990 में घटित हुई. जिहादी इस्लामिक ताकतों ने कश्मीरी पंडितों पर ऐसा कहर ढाया कि उनके लिए सिर्फ तीन ही विकल्प थे - या तो धर्म बदलो, मरो या पलायन करो.

कश्मीरी पंडितों को आज भी न्याय का इंतजार है. साल 2020 एक नए युग की शुरुआत है. तीन दशक बीत जाने के बाद आज भी इस समुदाय के लिए घरवापसी की राह आसान नहीं है. मगर उम्मीद जरूर जगी है.