नई दिल्ली: लोकसभा में नागरिकता संशोधन बिल (CAB) पर चर्चा जारी है. सरकार आज ही बिल पास कराना चाहती है. कांग्रेस, एनसीपी, टीएमसी और डीएमके समेत अन्य विपक्षी पार्टियां बिल को संविधान के खिलाफ बताते हुए विरोध कर रही हैं. वहीं सत्तारूढ़ बीजेपी को नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू, जगनमोहन रेड्डी की पार्टी YSRCP और तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) का साथ मिला है. नागरिकता संशोधन बिल पर जेडीयू ने कल तक रुख स्पष्ट नहीं किया था. हालांकि आज लोकसभा में बिल का समर्थन किया.

जेडीयू सांसद राजीव रंजन सिंह ने लोकसभा में कहा, ''हम इस बिल का समर्थन करते हैं. इस बिल को भारतीय नागरिकों के बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए. अगर पाकिस्तान के सताए गए अल्पसंख्यकों को भारतीय नागरिकता दी जाती है तो मुझे लगता है कि यह सही बात है.''

इससे पहले गृह मंत्री अमित शाह ने नागरिकता संशोधन विधेयक को ऐतिहासिक करार देते हुए सोमवार को कहा कि यह बीजेपी के घोषणापत्र का हिस्सा रहा है. उन्होंने कहा कि 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में देश के 130 करोड़ लोगों ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बनाकर इसकी मंजूरी दी है.

शाह ने लोकसभा में विधेयक को चर्चा एवं पारित करने के लिए रखते हुए कहा कि हम पूर्वोत्तर की स्थानीय संस्कृति और रीति रिवाज का संरक्षण करने के लिये प्रतिबद्ध हैं. गृह मंत्री ने कहा कि हम पूर्वेात्तर के लोगों का आह्वान करते हैं कि वे किसी उकसावे में नहीं आएं. उन्होंने कहा कि यह विषय हमारे घोषणापत्र में शामिल रहा है जो जनभावनाओं का प्रतिनिधित्व करता है.

वहीं कांग्रेस ने नागरिकता संशोधन विधेयक को असंवैधानिक और संविधान की मूल भावना के खिलाफ बताया. पार्टी ने कहा कि इसमें न केवल धर्म के आधार पर भेदभाव किया गया है बल्कि यह सामाजिक परंपरा और अंतरराष्ट्रीय संधि के भी खिलाफ है. लोकसभा में नागरिकता संशोधन विधेयक पर चर्चा में हिस्सा लेते हुए कांग्रेस के मनीष तिवारी ने कहा, ‘‘ यह विधेयक असंवैधानिक है, संविधान की मूल भावना के खिलाफ है. जिन आदर्शों को लेकर बाबा साहब भीमराव आंबेडकर ने संविधान की रचना की थी, यह उसके भी खिलाफ है.’’

उन्होंने कहा कि नागरिकता कानून में आठ बार संशोधन किया गया है लेकिन जितनी उत्तेजना इस बार है, उतनी कभी नहीं थी. इसका कारण यह है कि यह अनुच्छेद 14, 15, 21, 25 और 26 के खिलाफ है. तिवारी ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 14 किसी भी व्यक्ति को भारत के कानून के समक्ष बराबरी की नजर से देखने की बात कहता है. लेकिन यह विधेयक बराबरी के सिद्धांत के खिलाफ है.