नई दिल्ली: भारत और चीन के बीच उच्च स्तरीय संपर्क की कड़ी को आगे बढ़ते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग दूसरी अनौपचारिक शिखर बैठक के लिए महाबलीपुरम में मिलेंगे. इस बैठक के लिए राष्ट्रपति जिनपिंग 11-12 अक्टूबर के भारत में होंगे. चीन के वुहान के बाद चेन्नई के करीब महाबलिपुरम में हो रही ये मुलाक़ात दोनों देशों के बीच मतभेदों की सिलवटें मिटाने का मौका देेगी वहीं भारत-चीन रिश्तों के लिए आगे की राह तय करने का भी मौका होगी.

विदेश मंत्रालय के मुताबिक महाबलिपुरम में होने वाली अनौपचारिक बैठक जहां दोनों नेताओं को द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक महत्व के मुद्दों पर अपनी चर्चा को बढ़ाने का नया मौका देगी. वहीं भारत और चीन के बीच नज़दीकी सहयोग साझेदारी को बढ़ाने का भी अवसर देगी. बीते साल चीन के वुहान में हुई मुलाकात के बाद दोनों नेता दूसरी बार अनौपचारिक बैठक के लिए साथ होंगे.

सूत्रों के मुताबिक राष्ट्रपति शी जिनपिंग करीब 26 घण्टे के लिए भारत होंगे और इस दौरान वो और प्रधानमंत्री मोदी 7 घण्टे से ज़्यादा वक्त तक साथ होंगे. बंगाल की खाड़ी के समुद्री तट और पत्थर पर तराशे खूबसूरत मंदिरों की छांव में दोनों नेता सीधे संवाद के लिए साथ होंगे. वुहान की मुलाकात के एक साल में यह छठा मौका होगा जब दोनों नेता साथ होंगे.

अगस्त 2019 में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 खत्म किए जाने के बाद यह पहला मौका होगा जब मोदी और शी आमने-सामने होंगे. भारत के इस फैसले और अपनी स्थिति पर समझने के बावजूद चीन ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में इस मुद्दे को उठाने की अगुवाई की थी. हालांकि राष्ट्रपति जिनपिंग की भारत यात्रा से पहले अपने सेना प्रमुख के साथ बीजिंग पहुंचे पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान को झटका देते हुए साफ कर दिया कि वो कश्मीर मुद्दे को वो द्विपक्षीय वार्ता से ही सुलझाएं.

दरअसल, अप्रैल 2018 में चीन के वुहान शहर में राष्ट्रपति शी जिनपिंग और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहली अनौचारिक बैठक के बाद दोनों देश जहाँ उच्च स्तरीय संपर्कों के सिलसिले बनाने और सीमा तनावों को घटाने में कामयाब रहे हैं. वहीं, अनेक मूलभूत मुद्दों पर असहमतियों के कांटे लगातार रिश्तों की गाड़ी को रोकते रहे हैं. मसूद अजहर को अन्तरराष्ट्रीय आतंकी घोषित करने का मुद्दा हो या कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने जैसे भारत के आंतरिक फैसले पर चीन का रवैया. या फिर पूर्वोत्तर क्षेत्र में भारतीय सेना के अभ्यास हिम विजय को लेकर बीजिंग का ऐतराज़ से लेकर FATF में खराब रिपोर्टकार्ड के बावजूद पर ब्लैकलिस्टिंग से बचने में पाकिस्तान की मदद जैसा मामला. बीते एक साल का दौरान कई मोर्चों पर चीन का रवैया 'वुहान सहयोग भावना' और आपसी सहयोग के संकल्प से रास्ता बदलता नज़र आता है.

इस्टीट्यूट ऑफ चाइना स्टडीज़ और चीन में भारत के राजदूत रह चुके अशोक कांत के मुताबिक महाबलिपुरम में होने वाली पीएम मोदी और राष्ट्रपति जिनपिंग की मुलाकातअनौपचारक है. यानी न तो इस बैठक का कोई अजेंडा है कर न ही मुलाकात का बाद किसी समझौते या घोषणा का दबाव. लिहाज़ा नेताओं के पास सीधे संवाद के जरिए उन मुद्दों पर बात करने का मौका होगा जो दोनों देशों के रिश्तों में अक्सर मतभेद के मौके देते है. राजदूत अशोक कांत के मुताबिक इस दौरान भारत का प्रयास होगा कि सीमा विवाद को सुलझाने की दिशा में रफ्तार बढ़ाने के साथ ही द्विपक्षीय कारोबार घाटे की खाई पाटने के लिए नई कवायद शुरू करने पर सहमति बने.

भारत-चीन बीच 4000 किमी से ज़्यादा लंबी और अनसुलझी सीमा है जिसे वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी LAC कहा जाता है. यहां एक अदृश्य रेखा और अपनी अपनी मान्यता के मुताबिक दोनों देश सरहद को तय करते हैं. धारणाओं के अंतर के कारण कई बार LAC पर दोनों देशों के सैनिक आसान सामने आ जाते हैं. हालांकि दोनों देशों के बीच बनी संवाद व्यवस्थाओं के चलते गतिरोध और मतभेद किसी टकराव की सूरत टल जाती है. डोकलाम तनाव के बाद हुई वुहान शिखर बैठक में बनी सहमति का असर भी था कि बीते एक साल में LAC पर किसी बड़े सैन्य गतिरोध की स्थिति नहीं बनी. हालांकि, अब भी दोनों देशों के बीच सीमा मामले को सुलझाने के लिए करीब दो दशक से चल रही विशेष प्रतिनिधि स्तर वार्ता में बड़ी कामयाबी हाथ नहीं लगी है. इस कड़ी अब तक दोनों देशों के विशेष प्रतिनिथि अब तक 20 से ज़्यादा मुलाकातें कर चुके हैं. ऐसे में उम्मीद है कि सीमा विवाद निपटारे के लिए दोनों नेता किसी नई कवायद पर भी राजी हो सकते हैं.

सरकार के उच्च पदस्थ सूत्रों के मुताबिक, सुरक्षा और सीमा मुद्दे तथा सरहदों पर शांति पर स्वाभाविक तौर पर होगा. इसके लिए ज़रूरीतंत्र अपनी जगह पर हैं और काम रहे हैं. विश्वासी बहाली के अतिरिक्त उपायों पर भी अहम निर्णय की संभावना. हालांकि इन उपायों की घोषणा तुरंत नहीं की जाएगी. जब कोई उच्च स्तरीय रक्षा आदान-प्रदान होता है या विशेष प्रतिनिधि स्तर की वार्ता के समय उनकी घोषणा की जा सकती है.

कारोबारी घाटा कम करने के कवायद
भारत और चीन के बीच द्विपक्षीय कारोबार 100 अरब डॉलर से ज़्यादा है मगर इसमें घाटे का पलड़ा भारत की तरफ ही झुका है. यानी चीन से भारत का आयात याद है तो निर्यात काफी कम. भारत की तरफ से लगातार दबाव बनाए जाने किस बावजूद चीन में भारत के उत्पाद और सेवाओं के लिए बराबरी से दरवाज़े नहीं खोले हैं. वुहान में हुई पहली अनौपचारिक बैठक के बाद चीन ने भारत के कुछ कृषि उत्पादों के लिए अपने बाजार खोले और कुछ रियायतें भी दी जिनके चलते भारत-चीन के कारोबार घाटे में 10 अरब डॉलर की कमी आई. मगर अब भी घाटे की खाई 50 अरब डॉलर से ज्यादा है. ऐसे में उम्मीद है कि म