नई दिल्ली: अयोध्या फैसले पर दाखिल पुनर्विचार याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट कल विचार करेगा. 5 जज बंद चैंबर में याचिकाओं को देखकर तय करेंगे कि इन पर खुली अदालत में सुनवाई करनी है या नहीं. अगर जज इसे खुली अदालत में सुनवाई लायक नहीं मानेंगे तो पुनर्विचार अर्ज़ियां खारिज हो जाएंगी. अगर जज इसे सुनवाई के लायक मानते हैं तो वकीलों को खुली अदालत में जिरह करने का मौका मिलेगा.

क्या था फैसला
9 नवंबर को दिए ऐतिहासिक फैसले में कोर्ट ने पूरी 2.77 एकड़ जमीन रामलला को दी थी. कोर्ट ने मंदिर के निर्माण और प्रबंधन के लिए केंद्र सरकार को एक ट्रस्ट बनाने के लिए कहा था. 5 जजों का यह एकमत फैसला उपलब्ध तथ्यों के हिसाब से विवादित ज़मीन पर मुसलमानों की तुलना में ज़्यादा मज़बूत हिंदू दावे के चलते दिया गया था. फिर भी कोर्ट ने माना था कि 1857 से लेकर 1949 तक मुसलमानों ने वहां नमाज पढ़ी. 1949 इमारत में मूर्ति रख कर मुसलमानों को जबरन वहां से भगाया गया. 1992 मस्ज़िद को तोड़ दिया गया. इसलिए, कोर्ट ने पूरा इंसाफ करने के लिए सुन्नी वक्फ बोर्ड को अयोध्या में ही किसी वैकल्पिक जगह पर 5 एकड़ जमीन देने का आदेश दिया.

कुल 18 पुनर्विचार याचिकाएं
9 नवंबर को अयोध्या मामले पर आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लेकर कुल 18 पुनर्विचार याचिकाएं विचार के लिए जजों के सामने लगी हैं. 9 याचिकाएं पक्षकारों की हैं. जबकि, 9 ऐसे लोगों या संगठनों की हैं जो मुख्य मामले में पक्ष नहीं थे.

याचिका दाखिल करने वाले 9 पक्षकार
मुस्लिम पक्ष की तरफ से 6 याचिकाएं मो. उमर, मिसबाहुद्दीन, मौलाना हसबुल्ला, महफूज़ुर्रह्मान, हाजी महबूब और असद अहमद ने दायर की हैं. इन छह याचिकाकर्ताओं को मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का समर्थन हासिल है. एक याचिका जमीयत उलेमा ए हिंद से जुड़े मौलाना असद रशीदी की है.

हिंदू पक्ष की तरफ से हिंदू महासभा ने भी एक याचिका दाखिल की है. इस याचिका में अयोध्या में मुसलमानों को 5 एकड़ जमीन दिए जाने का विरोध किया गया है. इसके अलावा शिया वक्फ बोर्ड ने विवादित इमारत पर पहले सुन्नियों के नियंत्रण होने के फैसले को बदलने की मांग की है.

9 नए याचिकाकर्ता
पीस पार्टी के अध्यक्ष डॉ. मोहम्मद अय्यूब, केरल के राजनीतिक दल SDPI के साथ ही वकील प्रशांत भूषण के ज़रिए 40 सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी याचिका दाखिल कर पूरी विवादित ज़मीन रामलला को दिए जाने का विरोध किया है. इसके अलावा 6 और नई पुनर्विचार याचिकाएं जजों के सामने सूचीबद्ध हैं.

मुस्लिम पक्ष की मांग
मुस्लिम पक्ष की तरफ से दाखिल पुनर्विचार याचिकाओं में कहा गया है :-
9 नवंबर को आया फैसला 1992 में मस्जिद ढहाए जाने को मंजूरी देने जैसा.
1949 में अवैध रूप से जिस मूर्ति को रखा गया उसी के पक्ष में फैसला सुनाया गया.
अवैध हरकत करने वालों को ज़मीन दी गई.
हिंदुओं का कभी वहां पूरा कब्ज़ा नहीं था.
मुसलमानों को 5 एकड़ जमीन देने का फैसला पूरा इंसाफ नहीं कहा जा सकता.
सुप्रीम कोर्ट 9 नवंबर के फैसले पर रोक लगाए. मामले पर दोबारा विचार करे.

हिंदू महासभा की याचिका
हिंदू महासभा की तरफ से दाखिल पुनर्विचार याचिका में कहा गया है कि बाहरी और भीतरी हिस्से पर हिंदू दावा मज़बूत होने के चलते जगह रामलला को मिली. इसके बदले में मुसलमानों को अलग से 5 एकड़ जमीन देने की ज़रूरत नहीं थी. कोर्ट को इसे निरस्त करना चाहिए. 1992 में बाबरी विध्वंस की घटना को ‘अवैध’ और ‘ज़्यादती भरा’ बताने वाली टिप्पणी को भी फैसले से हटाने की मांग हिंदू महासभा ने की है.

सुन्नी वक्फ बोर्ड को फैसला मंज़ूर
गौरतलब है कि मामले का मुख्य मुस्लिम पक्षकार सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड फैसले को स्वीकार करने की बात कह चुका है. सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से सुन्नी वक्फ बोर्ड को 5 एकड़ ज़मीन देने को कहा था. मामले के पक्षकार इकबाल अंसारी भी कह चुके हैं कि उन्हें कोर्ट का फैसला मंज़ूर है. वह इसे बदलने की मांग नहीं करेंगे.

कल बंद कमरे में होगा विचार
पुनर्विचार याचिका के लिए तय नियम के मुताबिक उस पर वही जज विचार करते हैं जिन्होंने मामले की सुनवाई कर फैसला दिया था. बंद चैंबर में जज याचिका को देख कर तय करते हैं कि क्या उसमें कोई ऐसा बिंदु उठाया गया है जिस पर उन्होंने अपने मुख्य फैसले में जवाब नहीं दिया था? क्या कोई ऐसी बात है जिस पर दोबारा विचार किए जाने की जरूरत है? अगर जजों को ऐसा लगता है तो वह मामले में की खुली अदालत में सुनवाई का आदेश देते हैं. ऐसे में सभी पक्षों को नोटिस जारी कर कोर्ट में बुलाया जाता है. दोनों पक्षों के वकील जिरह करते हैं.

अगर जजों को ऐसा लगता है कि पुनर्विचार याचिका में कोई भी ऐसी बात नहीं कही गई है, जिसके चलते दोबारा सुनवाई जरूरी हो. तो वह पुनर्विचार याचिका को खारिज करने का आदेश दे देते हैं.

एक नए जज बेंच में
सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या मामले की सुनवाई करने वाली 5 जजों की बेंच के एक सदस्य चीफ जस्टिस रंजन गोगोई अब रिटायर हो चुके हैं. ऐसे में पांच जजों का कोरम पूरा करने के लिए उनके बदले जस्टिस संजीव खन्ना को बेंच में शामिल किया गया है. ऐसे में कल मामले पर विचार करने वाली बेंच यह है- मौजूदा CJI एस ए बोबड़े, जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़, अशोक भूषण, एस अब्दुल नज़ीर और संजीव खन्ना. लिस्ट के मुताबिक दोपहर 1.40 पर पांचों जज एक साथ बैठेंगे.

निर्मोही की याचिका लिस्ट में नहीं
आज निर्मोही अखाड़ा ने भी रिव्यू पेटिशन दाखिल की है. कहा है कि हम राम मंदिर का रास्ता खोलने वाले फैसले का स्वागत करते हैं. उसमें बदलाव की मांग नहीं है. लेकिन कोर्ट मंदिर से जुड़े ट्रस्ट में हमारी भूमिका पर स्पष्टता दे. सुमित्रा भवन, सीता कूप जैसे मंदिरों को अपने नियंत्रण में देने की दरख्वास्त भी निर्मोही अखाड़ा ने की है. लेकिन आज ही दाखिल होने के चलते निर्मोही की याचिका कल विचार के लिए नहीं लगी है.