मुंबई: शिवसेना के मुखपत्र 'सामना' एक बार फिर केंद्र की मोदी सरकार पर निशाना साधा गया है. इस बार मंहगाई को लेकर केंद्र सरकार की आलोचना की गई है. सामना में कहा गया है, 'महंगाई का विस्फोट पहले से ही है. हालांकि अब उसकी ज्वालाएं कुछ ज्यादा ही भड़क उठी हैं. खुदरा मुद्रास्फीति दर गत 5 वर्षों के शिखर पर है. '

संपादकीय में कहा गया, 'रिजर्व बैंक को अपेक्षा थी कि महंगाई की दर चार प्रतिशत के आसपास रहेगी. लेकिन हकीकत में ये दर 7.35 प्रतिशत तक पहुंच गई है. मतलब ये कि महंगाई अंदाज से लगभग दोगुनी हो गई है. एक तरफ आर्थिक विकास की दर नीचे चली गई, वहीं दूसरी तरफ महंगाई का निर्देशांक आसमान को चूम रहा है.'

सामना में लिखा है, '2014 और 2019 में भी उनकी पूर्ण बहुमत की सरकार बनी लेकिन आर्थिक विकास का गिरना नहीं थमा और महंगाई थमने का नाम नहीं ले रही. सब्जी से लेकर खाद्यान्न तक और जीवन के लिए जरुरी वस्तुओं से लेकर सोना-चांदी तक सब कुछ महंगा हो रहा है.'

इस पर पश्चिम एशिया में संघर्ष के कारण कच्चे तेल की कीमत बढ़ी तो महंगाई की आग में तेल डाला जाएगा. पहले ही सब्जियों की कीमत लगभग 60 प्रतिशत और अनाज व खाद्य पदार्थों की कीमत 15 से 20 प्रतिशत बढ़ चुकी है. ये कीमत और बढ़ी तो आम जनजीवन अस्त-व्यस्त हो जाएगा.

'अर्थव्यवस्था गिरने से उद्योग-व्यवसाय पर मंदी की छाया है. जनता की क्रय शक्ति घटने के कारण बाजार में मंदी आई है. इससे बेरोजगारी बढ़ रही है. एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार गत वर्षों की तुलना में वर्तमान आर्थिक वर्ष में रोजगार निर्माण के क्षेत्र में 16 लाख नौकरियों पर तलवार लटकेगी. मतलब अपेक्षा से 16 लाख कम रोजगार निर्माण होगा.

सामना में प्रधानमंत्री मोदी से सवाल करते हुए कहा, 'देश की अशांति या अस्थिरता हो, अर्थव्यवस्था का गिरना हो या महंगाई और बेरोजगारी का मामला हो. उन्होंने इन मुद्दों पर मौन धारण किया हुआ है. जो लोग इसके खिलाफ बोलते हैं उन्हें ‘भक्त’ लोग देश विरोधी ठहराने का काम करते हैं.'

'2014 के लोकसभा चुनाव में ‘महंगाई डायन खाये जात है’ का प्रचार करके जिन्होंने सत्ता हासिल की, उनके राज में यही ‘महंगाई डायन’ फिर से आम जनता की गर्दन पर बैठ गई है. ‘अच्छे दिन’ जब आएंगे तब आएंगे लेकिन इस महंगाई को देखते हुए आम जनता के जीवन में कम-से-कम पहले जो ‘ठीक दिन’ थे, वही ले आओ.'