एक चाय-दो बिस्कुट वाला पत्रकार भवन ज़मीदोज़ शिकस्तगी में भी क्या शान है इमारत की, कि देखने के लिए इसे सर उठाना पड़ता है। रोशनपुरा से 74 बंगला जाने वाली सड़क पर आप की नजर पत्रकार भवन की शिक स्ता हो चली इमारत पर पड़ ही जाती थी। ये इमारत इस इलाके का लैंडमार्क थी और भोपाल में सत्तर से अस्सी के दशक के बाद तक रेडिकल पत्रकारों का मशहूर ठिया भी थी। आज जब इसे जमीदोज किया गया तो यकीनन उन मरहूम पत्रकारों की रूह को जरूर तकलीफ हुई होगी जिन्होंने इसकी तामीर में अपना खून पसीना लगा दिया। मसलन मरहूम धन्नालाल शाह, नितिन मेहता, एन राजन,त्रिभुवन यादव, प्रेम श्रीवास्तव, इश्त्यिाक आरिफ, डीवी लेले, सूर्यनारायण शर्मा और वीटी जोशी अब इस दुनिया में नहीं हैं। उस दौर के पत्रकार एलएस हरदेनिया बताते हैं कि धन्नालाल शाह, नितिन मेहता और प्रेम श्रीवास्तव ने इस इमारत को बनाने में बहुत मेहनत करी। 1968 में तत्कालीन सीएम गोविंद नारायण सिंह से मिल कर मालवीय नगर में जमीन अलॉट कराई। इसक ी तामीर की इब्तिदा में श्यामाचरण शुक्ल, राजमाता विजयाराजे सिंधिया, विरेंद्र कुमार सकलेचा और कैलाश जोशी भी आए थे। पत्रकारों के पास पचास हजार रुपए थे। राजमाता ने 21 हजार दिए और सीएम सहित अन्य लोगों ने भी पैसा दिया। तब 1970 में ये इमारत बन के खड़ी हो गई। खर्चा चलान के लिए यहां कई अखबारों और न्यूज एजेंसियों के दफ्तर खुले। एक जमाना था तब यहां देश भर से आने वाले पत्रकार रुका करते थे। पत्रकार वार्ता के लिए नियम था, एक चाय और दो बिस्कुट के अलावा पत्रकार और कुछ नहीं स्वीकारते थे। क्या रौनकें हुआ करती थीं। मरहूम जगत पाठक, राजेंद्र नूतन, प्रशांत कुमार, अलीम बजमी भी यहां नियमित आया करते। इसके आॅडिटोरियम के लिए मरहूम नितिन मेहता ने पुराने भोपाल की कृष्णा टाकीज की कुर्सियां ओने-पोने में खरीद कर यहां लगवाई थीं। यहां अर्जुन सिंह, सुंदर लाल पटवा और श्यामाचरण शुक्ल तक की प्रेस कान्फें्रस हुआ करती थीं। पीसी करवाने वाले आयोजक यहां रहने वाले केयरटेकर रमेश को आमंत्रण पत्र दे देते थे। रमेश काका उसे सभी अखबारों में पहुंचा आते। इससे उनका काम और दारु का इंतजाम हो जाया करता। शुरुआत में  पत्रकार भवन समिति के हाथ में ये इमारत थी। बाद के सालों में सीनियर जर्नलिस्टों ने इसमें दिलचस्पी लेना ही छोड़ दिया। फिर शलभ भदौरिया ने मप्र श्रमजीवी पत्रकार संघ का रजिस्ट्रेशन करा कर उसका मुख्यालय यहां बना लिया। इसकी सरकारी लीज खत्म हो गई। आखिरकार कोर्ट के आदेश से इस जर्जर इमारत को ढहा दिया गया। इसके ढहते ही तब और अब के तमाम पत्रकारों की यादें भी जमीदोज हो गर्इं हैं। यहां सरकार एक मीडिया सेंटर बनाना चाहती है। अब देखिये आगे क्या कुछ होता है।