नई दिल्ली: यूपी शिया वक्फ बोर्ड ने चांद-तारे वाले हरे झंडे पर पाबंदी की मांग की है. इस मामले में आज सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से 2 हफ्ते में अपना पक्ष रखने को कहा है. यूपी शिया वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष वसीम रिजवी ने इस झंडे पर बैन लगाने की मांग ये कहते हुए कि है कि इसका इस्लाम से कोई संबंध नहीं है. उन्होंने कहा कि इस झंडे से बेवजह सांप्रदायिक तनाव बढ़ता है.

बता दें कि पिछले साल ही कोर्ट ने सरकार से मसले पर जवाब मांगा था. उस समय कोर्ट ने कहा था, "कई बार सरकार के लिए किसी मसले पर कदम उठाना मुश्किल होता है. उसे डर होता है कि लोग उसके कदम को दुर्भावनावश उठाया हुआ मान लेंगे. अब ये मामला कोर्ट में है. अगर आपको इस मसले पर कुछ कहना है तो कह सकते हैं." सरकार ने आज जवाब के लिए 2 हफ्ते का समय मांगा. कोर्ट ने इसकी इजाजत दे दी.

झंडे का इस्लाम से रिश्ता नहीं
रिज़वी की याचिका में कहा गया है कि इस झंडे का इस्लाम से कोई लेना देना नहीं है. पैगंबर मोहम्मद जब मक्का गए, तब उनके हाथ में सफेद झंडा था. मध्य युग में भी इस्लामिक फौजों के अलग-अलग झंडे होते थे. उन्होंने काह कि चांद तारे वाले हरे झंडे का 1906 से पहले कोई वजूद नहीं था.

जिन्ना की मुस्लिम लीग का झंडा
याचिका में कहा गया है कि 1906 में ढाका में इसे मुस्लिम लीग के झंडे के तौर पर डिजाइन किया गया. बंटवारे के बाद पाकिस्तान ने इसमें मामूली बदलाव कर इसे राष्ट्रीय ध्वज बनाया. अब भी पाकिस्तान मुस्लिम लीग कायदे-आज़म नाम की पार्टी इसी झंडे का इस्तेमाल करती है.

झंडा लगाने वालों पर कार्रवाई हो
रिज़वी के मुताबिक कट्टर और पाकिस्तानपरस्त लोगों ने भ्रम फैलाया है कि ये इस्लामिक झंडा है. ज़्यादातर लोगों को सच्चाई पता नहीं. उनके मकानों में कुछ स्वार्थी लोग ये झंडा लगा जाते हैं. वो इसे धार्मिक झंडा समझ कर लगा रहने देते हैं. मुस्लिम बस्तियों में भी यहां वहां इस झंडे को लगा दिया जाता है.

संप्रदायिक तनाव की बड़ी वजह
याचिका में कहा गया है कि मुस्लिम इलाकों में अज्ञानतावश लोग ये झंडा लगाते हैं. इसे अक्सर हिन्दू पाकिस्तान का झंडा समझ लेते हैं. ये सांप्रदायिक तनाव की वजह बनता है.