नई दिल्लीः प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महानायक और स्वतंत्रता सेनानी चंद्रशेखर आजाद की जयंति पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की है. शहीद चंद्रशेखर आजाद को श्रद्धांजलि देते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि 'वह एक निर्भीक और दृढ़ निश्चयी क्रांतिकारी थे, जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपने जीवन की आहुति दे दी.'

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट करते हुए कहा कि 'भारत माता के वीर सपूत चंद्रशेखर आजाद को उनकी जयंती पर मेरी विनम्र श्रद्धांजलि. वे एक निर्भीक और दृढ़ निश्चयी क्रांतिकारी थे, जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपने जीवन की आहुति दे दी. उनकी वीरता की गाथा देशवासियों के लिए प्रेरणा का एक स्रोत है.'

भारत माता के वीर सपूत चंद्रशेखर आजाद को उनकी जयंती पर मेरी विनम्र श्रद्धांजलि। वे एक निर्भीक और दृढ़ निश्चयी क्रांतिकारी थे, जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपने जीवन की आहुति दे दी। उनकी वीरता की गाथा देशवासियों के लिए प्रेरणा का एक स्रोत है। pic.twitter.com/nuHIfqi62J

— Narendra Modi (@narendramodi) July 23, 2019

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महानायक कहे जाने वाले शहीद चंद्रशेखर आजाद का जन्म 23 जुलाई 1906 को मध्य प्रदेश के झाबुआ जिले के भाबरा गांव में हुआ था, जिसे अब 'आजादनगर' के नाम से जाना जाता है. शहीद चंद्रशेखर आजाद जी के पिता का नाम पंडित सीताराम तिवारी और मां का नाम जगदानी देवी था.

14 वर्ष की उम्र में ही वह वाराणसी चले गए, जहां उन्होंने संस्कृत पाठशाला में पढ़ाई की और इसी दौरान उन्होंने कानून भंग आंदोलन में हिस्सा लिया. 1920 से 21 के दौरान वह गांधी के असहयोग आंदोलन से जुड़ गए और गिरफ्तार हुए. जेल में पेशी के दौरान उन्होंने अपना नाम 'आजाद' पिता का नाम 'स्वतंत्रता' और निवास 'जेल' बताया, जिसके चलते उन्हें 15 कोड़ों की सजा मिली.

17 दिसंबर 1928 को चंद्रशेखर आजाद, राजगुरू और भगत सिंह ने लाहौर में पुलिस अधीक्षक के दफ्तर को घर लिया और जैसे ही जेपी साण्डर्स बाहर निकले तो राजगुरू ने उन पर गोली दाग दी. फिर भगत सिंह ने भी साण्डर्स को गोली मारी और वहां से निकल लिए. इस पर जब साण्डर्स के अंगरक्षक ने उनका पीछा किया तो चंद्रशेखर आजाद ने उसे भी खत्म कर दिया.

अल्फ्रेड पार्क इलाहाबाद में 1931 में उन्होंने समाजवादी क्रांति का आह्वान किया, जहां उन्होंने संकल्प लिया कि वह कभी भी पकड़े नहीं जाएंगे और न ही ब्रिटिश सरकार के हाथों मारे जाएंगे और इसी संकल्प को पूरा करने के लिए उन्होंने 27 फरवरी 1931 को इसी पार्क में गोली मारकर देश के लिए खुद की आहुति दे दी.