नई दिल्ली: अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के पांचवें दिन रामलला विराजमान की तरफ से वरिष्ठ वकील सी एस वैद्यनाथन ने दलीलें रखीं. वैद्यनाथन ने साबित करने की कोशिश की कि पूरा जन्मस्थान हिंदुओं के लिए पूज्य है. ऐसे में उसका विभाजन करने वाला हाई कोर्ट का फैसला सही नहीं है.

परासरन की जिरह खत्म
दिन की शुरुआत रामलला की तरफ से पहले से पेश हो रहे वरिष्ठ वकील के परासरन की दलीलों से हुई. परासरन ने मुस्लिम पक्ष के वकील राजीव धवन को सुनवाई के दौरान तैयारी ब्रेक दिए जाने के प्रस्ताव विरोध किया. उन्होंने कहा, "ये तरीका उचित नहीं है. किसी वकील को मामले की सुनवाई के दौरान लगातार कोर्ट में बैठना चाहिए." इसके बाद परासरन ने अपनी दलीलें खत्म कर दीं. 93 साल के परासरन ने 3 दिनों में लगभग 11 घंटे खड़े होकर बहस की. शुरू में कोर्ट ने वयोवृद्ध वकील से बैठकर पक्ष रखने को कहा था. लेकिन उन्होंने विनम्रता से इस आग्रह को ठुकरा दिया था.

जन्मस्थान का बंटवारा संभव नहीं
परासरन के बाद जिरह के लिए खड़े हुए सी एस वैद्यनाथन ने कोर्ट से कहा, "किसी जगह पर मूर्ति का होना और उस मूर्ति को ही न्यायिक व्यक्ति का दर्जा देकर मुकदमे की सुनवाई करना जरूरी नहीं है. तमाम ऐसी जगह हैं, जहां कोई मूर्ति नहीं है. लेकिन लोग उसकी पूजा करते हैं. जैसे कैलाश पर्वत और कई नदियों की पूजा की जाती है. उन्हें अदालत को एक न्यायिक व्यक्ति की तरह ही देखना पड़ेगा." इस दलील पर सहमति जताते हुए बेंच के सदस्य जस्टिस अशोक भूषण ने कहा, "चित्रकूट में भगवान राम और देवी सीता के प्रवास की मान्यता है. वहां के कामदागिरी पर्वत को लोग पूज्य मानते हैं. उसकी परिक्रमा करते हैं.

वैद्यनाथन ने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, "ठीक इसी तरह से हिंदुओं के लिए पूरा राम जन्मस्थान पूज्य है. उसे खुद में एक देवता का दर्जा हासिल है. उसका विभाजन नहीं किया जा सकता. निर्मोही अखाड़ा वहां मौजूद मूर्ति की सेवा करने का दावा करता है. उसे भी जमीन का मालिकाना हक नहीं दिया जा सकता है."

बेंच के सदस्य जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ ने सवाल किया, "हमें बताया गया है कि अंदर के हिस्से में लंबे समय तक मुसलमान नमाज पढ़ते रहे. जबकि बाहर पूजा-पाठ हो रही थी. यानी दोनों पक्षों का जगह पर कब्जा था. आप दूसरे को गलत बताकर पूरी ज़मीन पर हक कैसे मांग सकते हैं?"

वैद्यनाथन ने जवाब दिया, "हजारों सालों से हिंदू विवादित जगह को राम का जन्मस्थान मानते रहे हैं. उनकी इस आस्था पर 1528 में 3 गुंबद वाले ढांचे के बनने से कोई असर नहीं पड़ा. चूंकि हिंदुओं का शासन नहीं था, इसलिए वो वहां पर अपने हिसाब से कोई नया मंदिर नहीं बनवा सके. लेकिन पूरी जगह को भगवान राम का जन्मस्थान मानकर पूजते रहे. देवता का बंटवारा नहीं हो सकता." वैद्यनाथन ने कोर्ट को ये भी बताया कि विवादित ढांचे को बनाने में वहां पहले से मौजूद रहे मंदिर के पत्थरों का इस्तमाल किया गया था. इसके बाद हिंदुओं ने कई बार स्थान पर पूरे कब्ज़े के लिए प्रयास किया.

धवन की टोकाटाकी से माहौल गर्म
आज एक बार फिर मुस्लिम पक्ष के वकील राजीव धवन ने रामलला के वकील की जिरह के दौरान तो टोकाटाकी करके थोड़ी देर के लिए कोर्ट में तल्ख स्थिति पैदा की. वैद्यनाथन की बहस के दौरान धवन अचानक बोल पड़े कि वो सिर्फ यहां वहां से कुछ पढ़ रहे हैं. उन्होंने अब तक कोई सबूत या दस्तावेज पेश नहीं किया. 5 जजों की बेंच की अध्यक्षता कर रहे चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने उनसे कहा, "आपको जब मौका मिलेगा तो आप खूब सबूत पेश करें. कोई दूसरा वकील किस तरह से अपना केस प्रस्तुत कर रहा है, इसे उस पर छोड़ दीजिए. अगर वो सबूत नहीं दे पा रहा है तो अपना केस कमजोर कर रहा है. आपका इस तरह से खलल डालना उचित नहीं है." कल भी सी एस वैद्यनाथन की दलीलें जारी रहेंगी.