दरिया के तलातुम से तो बच सकती है कश्ती, कश्ती में तलातुम हो तो साहिल न मिलेगा। छोटे तालाब में जहां हादसा हुआ, किनारा बहुत दूर नहीं था। बाक ी जो शहर सिर्फ नाम की राजधानी हो, जहां पुलिस और प्रशासन की कोई सुनता नहीं हो और जिम्मेदार अफसर नींद निकाल रहे हों, वहां तो ये होना ही था। खुदा ऐसा मंजर किसी को न दिखाए। छोटे तालाब में हुए इस दिल दहलाने वाले हादसे को लंबे समय तक भुलाय नहीं जा सकेगा। लेकिन इससे कित्ते लोग सबक लेंगे ये कहना मुश्किल है। बेटे की अंतिम यात्रा में बेहोश हुए पिता की तस्वीर अंदर तक हिला कर रख देती है। सुदेश गौड़ की त्वरित टिप्पणी के  हर लफ्ज से इत्तफाक रखा जा सकता है। मौत के मुंह से निकले युवाओं की आपबीती और गणेश भक्त परवेज की कहानी भी यहां है। अखबार ने सवाल उठाया है कि काश पुलिस, आपदा प्रबंधन और निगम सतर्क रहते तो ये हादसा न होता। बहरहाल जिन्होंने अपने बेटे खोए हैं उनके दुख को कोई मुआवजा पूरा नहीं कर सकता।